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जाति व्यवस्था की कहानी क्या सिद्धान्त बनेगी

by S. N. Balagangadhara
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कई साल पुरानी बात है। मैं कर्नाटक में एक अनुसन्धाताओं का एक नया वृंद तैयार करने की कोशिश में व्यस्त था। मेरे नये सिद्धान्त के बारे में लोगों में दिलचस्पी बढ़ रही थी। पढ़े-लिखे वर्ग में गरमागरम चर्चा भी होती थी। उसी बीच में एक गुट के लोग मेरे बारे में गलतफहमी फैलाने के लिए खूब प्रयास करते रहे। उसी सन्दर्भ में एक बड़ी सभा में ऐलान किया गया कि ‘मेरा अनुसन्धान नयी सदी के एक शर्मनाक अनुसन्धान में से एक है। इस अनुसन्धान को किसी-न-किसी तरह रोकना ही चाहिए। किसी मित्र ने उपरोक्त खबर सुनायी तो मुझे बहुत खेद हुआ। मैं बहुत चिन्तित हुआ कि ‘क्या मेरा कोई विद्यार्थी गलत कार्य कर रहा है, जिसका मुझे पता ही नहीं है?’ पूछताछ करने के बाद पता चला कि उन लोगों ने मुझ पर उपरोक्त फर्मान इसलिए बरकरार किया है कि मैं ‘भारत में जाति व्यवस्था नहीं है’ कह रहा हूँ। किसी भी स्थापित सिद्धान्त को झूठा सिद्ध करना उसके वैज्ञानिक होने का एक महत्त्वपूर्ण गुणलक्षण है। इसमें बेशर्म होने की क्या बात है? यह बात अब भी मेरे दिमाग में एक पहेली बनकर पड़ी हुई है। 

आखिर इस जाति व्यवस्था वाले सिद्धान्त में क्या है? उस सिद्धान्त के अनुसार वेदकाल में ‘हिन्दूइज्म’ नामक रिलिजन अपने शुद्ध रूप में था। कालांतर में पुरोहितशाहियों ने अपने लाभ के लिए भेदभाव की सृष्टि करके वर्ण विभाजन किया। उसके फलस्वरूप वह ऊँच-नीच वाली जाति व्यवस्था का मूलतत्त्व बनकर हिन्दूइज्म में जुड़ गयी। मनुधर्म शास्त्र द्वारा जाति व्यवस्था के कानून बनाकर लोगों पर थोपे गये। उसके बाद यही व्यवस्था मजबूत बनकर अनूचे रीति से सदियों से चली आयी। अतः जाति व्यवस्था के सिद्धान्त के अनुसार भारत में जो सामाजिक वैविध्य है जैसाकि जाति, मत, कुल, समुदाय, आदि वह किसी एक समुदाय या जाति के लाभ के लिए बनायी गयी व्यवस्था है। उसे लोगों पर गलत तरीके से थोपा गया है। इस व्यवस्था से उच्च जाति के लोगों का कल्याण होता है और नीच जाति के लोगों का शोषण।

         मैं इस कपोल-कल्पित कहानी को जाति व्यवस्था का सिद्धान्त कहकर पुकारता हूँ। आप एक बार अपने को परख लीजिए कि आपको इस कहानी की जानकारी है कि नहीं। आपको यह मालूम है तो समझ लेना चाहिए कि यह जाति व्यवस्था के सिद्धान्त का परिचय है। आप को लगेगा कि जाति व्यवस्था के बारे में इतना विवरण देने की क्या जरूरत है? जरूरत है! क्योंकि बहुत सारे लोगों को आज भी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या कह रहा हूँ। मेरे विरोधी लोग मेरे विरुद्ध प्रचार और आंदोलन करके मेरी खिल्ली उड़ाने में रम रहे हैं। उनका कहना है कि मैं ‘भारत में जातियाँ ही नहीं हैं कहकर ऐलान कर रहा हूँ। मुझे सामाजिक शोषण का समर्थक कहकर खलनायक बनाने का प्रयास भी चल रहा है। उसके बाद कई लोग बोलते फिर रहे हैं कि मैं उपनिवेशोत्तर प्रणाली को दोहरा रहा हूँ। मेरे ऊपर इन सभी प्रकार के प्रहार प्रगतिवादी मुखौटे की आड़ में ही हो रहे है। मुझसे किसी धर्मात्मा ने ऐसा सवाल भी पूछा कि क्या हमारा भारतीय समाज इतना अव्यवस्थित है? हमारे समाज में स्थित चार वर्णों के बारे में हमारे प्राचीन ग्रन्थ ही प्रमाण हैं। यह सब सरासर झूठ है क्या?’ परन्तु डटकर कहता हूँ कि कोई मुझसे भारत की जाति व्यवस्था के बारे में पूछे तो मेरा उत्तर यही होगा ‘भारत में जाति व्यवस्था नहीं है।’

         एक काम करेंगे हमारे आसपास में जो अनगिनत जातियाँ हैं, मत हैं वे विभिन्न सम्प्रदाय के समुदाय हैं, उन सभी को चार वर्णों में विभक्त करते जायेंगे। अन्त में ऐसी अनेक जातियाँ बच जायेंगी जो किसी भी वर्ण के अन्तर्गत आती ही नहीं हैं। इसका क्या नतीजा निकलता है? उत्तर होगा हम जो देख रहे हैं वह वर्ण व्यवस्था तो नहीं है। विरोधी दल के पास उसके लिए भी साधा हुआ तीर है। वे कहते हैं कि किसी जमाने में रही वर्ण व्यवस्था कालांतर में जाति व्यवस्था में परिणत हुई।’ प्राचीन काल में हमारा समाज इसी प्रकार का था कहने के लिए हमारे पास क्या सबूत है? इस प्रकार जो कहते रहते हैं उसके लिए कोई ठोस आधार नहीं है। इन किंवदंतियों के अलावा किसी ने ठोस आधार दिया भी नहीं है। परन्तु सभी लोग इसी कहानी को दोहराते हैं कि कोई हमारे इस समाज को सामाजिक नियमों ने जकड़ लिया है। उन नियमों के कारण ही लोग जाति-भेद शोषण के शौकीन बन गये। 

         इस कहानी की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लगायें तो इतना प्रतिरोध क्यों आना चाहिए? मेरा अनुसंधान इस सदी का बेशर्म काम कैसे हो जाता है। मुझे क्यों लज्जित होना चाहिए? इनका कहना है कि मैं कोई नाजायज काम करने में संलग्न हूँ। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि इस अनुसन्धान में लज्जित होने लायक कौन-सी बात छिपी हुई है? ऐसा लगता है कि ये मेरे विरोधी दल के लोग अलग-अलग दो विषयों को आपस में कार्य कारण की तरह जोड़ रहे हैं। जैसे भारतीय समाज में दिखाई देने वाला अन्याय छुआछूत समस्या के मूल में जाति व्यवस्था की कहानी को जोड़ रहे हैं। सदियों से यही कहते आये हैं कि भारतीय समाज में होने वाले शोषण के मूल में जाति व्यवस्था ही है। प्रायः इसी कारण से जब मैं भारतीय समाज में जाति व्यवस्था नहीं है कहता हूँ तो ये लोग कहते हैं कि सदियों से चला आया सामाजिक अन्याय का पोषण, अनुसन्धान की आड़ में कर रहा हूँ। बिना सबूत के अपराध थोप कर अपराधी के कटघरे में मुझे खड़ाकर देते हैं। 

         जाति व्यवस्था भारत के लिए विशिष्ट है। जाति व्यवस्था अन्याय व शोषण केवल भारतीय समाज की विशेषता है। कहा जाता है कि दुनिया के किसी भी देश में इस प्रकार की क्रूर व्यवस्था नहीं है। भारतीय क्रिस्त व मुसलमान इस क्रूर व्यवस्था से छूट न पाये। परन्तु मैं जो आगे कहने जा रहा हूँ उसे सुनने के बाद आपको जरूर लगेगा कि यह बात कितना तमाशाबीन है। ब्रिटिशों के शासन काल में करीबन 1947 ईसवी तक भारत के साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश जुड़ा हुआ था। सभी विद्वानों ने कहा था कि तब भी भारतीय समाज जाति व्यवस्था के चंगुल से मुक्त नहीं था। अब तो उपरोक्त राष्ट्र भारत से मुक्त हो चुके हैं। परन्तु आज कोई भी विद्वान यह नहीं कहता है कि उन देशों में भी जाति व्यवस्था है। परन्तु यह दोहराते रहते हैं कि केवल भारत में जाति व्यवस्था है। आश्चर्य की बात है कि यह जो गतकाल से आयी हुई समस्या है वह भारत का नक्शा बदलने से केवल भारत के लिए सीमित हो सकती है क्या? 

         जाति व्यवस्था से सम्बन्धित और एक मुद्दा है। जाति व्यवस्था के साथ जुड़ी हुई कौन-कौन सी समस्याएँ हैं? वही छुआछूत समस्या, ऊँच-नीच भाव, शोषण, अन्याय, हिंसा आदि। विरोधियों का समर्थन है कि ये सब जाति व्यवस्था से उत्पन्न समस्याएँ हैं। परन्तु यह केवल जाति व्यवस्था से जकड़ा हुआ भारत मात्र की समस्या नहीं है। यह पूरी दुनिया की समस्या है। अथवा मनुष्य मात्रों की समस्या है। तो आप कैसे समर्थन कर सकते हैं कि यह केवल भारत की समस्या है। जाति व्यवस्था अथवा तरतम पद्धति केवल भारत में है, यह कहने के लिए दंत-कथाओं के अलावा और कोई सबूत नहीं है। भारत में केवल उच्च जाति के लोगों में उपरोक्त सभी दुर्गुण मौजूद रहते हैं, यह कहना कितना तमाशे की बात है। यदि हम जाति व्यवस्था की बात को मान लेंगे तो इसके अनुसार केवल उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों पर शोषण करते हैं। परन्तु ऐसे उदाहरण भी दिखते हैं। जैसे निम्न जाति के लोगों द्वारा निम्न जाति के लोगों पर किये जाने वाले शोषण, निम्न जातियों द्वारा उच्च जाति के लोगों पर होने वाला शोषण, अपनी जाति के लोग अपने लोगों पर किये जाने वाले शोषण आदि। इन शोषणों को हम किस रीति से समझ सकते हैं। ये जाति व्यवस्था से जुड़ी हुई समस्याएँ नहीं हैं। हमारे समाज में ऐसी अनेक समस्याओं के उदाहरण मिल सकते हैं। 

         कहा जाता है कि केवल ब्राह्मण जाति के लोग निम्न जाति के ऊपर अपमानजनक, अनारोग्यपूर्ण, हिंसात्मक नियमों को थोप रहे हैं। परन्तु वही ब्राह्मण लोग अन्यों से अधिक अपने ऊपर नियम डालकर अन्य नियमों से जकड़े हुए हैं? ब्राह्मणों द्वारा खुद के नियमों को तोड़ने के लिए जितने आन्दोलन हुए हैं उतने आन्दोलन अन्यों के साथ हुए नहीं है। भारतीय समाज में रहने वाला हर व्यक्ति जानता है कि हर जाति के अपने-अपने नियम होते हैं और अपनी खास सामाजिक पद्धति होती हैं। वे सदियों से  अपने नियमों का पालन परंपरानिसृत रूप से करते आये हैं। ऐसी स्थिति में ब्राह्मण लोग अपने ऊपर इतने सारे नियमों को क्यों लाद लेते हैं? 

         भारत के विभिन्न सामाजिक समुदाय के लोग ऐसे क्यों रहते हैं? वे क्रैस्त व मुसलमान रिलिजन की तरह क्यों नहीं हैं? आदि सवालों के जवाब के रूप में उपरोक्त जाति व्यवस्था वाली कहानी ब्रिटिशों द्वारा उपजी हुई है। हमारी सामाजिक विभिन्नता को समझने के प्रयास में सभी लोग इसे एक सिद्धान्त के रूप में अपना चुके हैं। हिन्दूइज्म, उनके धर्मग्रन्थ, उनके तत्त्व, उनके कानून, ब्राह्मण पुरोहितशाही आदि सचमुच नहीं हैं। यदि ये नहीं हैं तो जाति व्यवस्था वाली कहानी भी सरासर झूठ है। क्योंकि उपरोक्त मुद्दों के आधार पर ही जाति व्यवस्था वाली कहानी उपजी हुई है। मैं अनुसन्धान करते हुए इसी निर्णय पर आ चुका हूँ। 

Authors

  • S. N. Balagangadhara

    S. N. Balagangadhara is a professor emeritus of the Ghent University in Belgium, and was director of the India Platform and the Research Centre Vergelijkende Cutuurwetenschap (Comparative Science of Cultures). His first monograph was The Heathen in his Blindness... His second major work, Reconceptualizing India Studies, appeared in 2012.

  • Dr Uma Hegde

    (Translator) अध्यक्षा स्नातकोत्तर हिन्दी अध्ययन एवं संशोधूना विभाग, कुवेंपु विश्वविद्यालय, ज्ञान सहयाद्रि शंकरघट्टा, कर्नाटक

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