Home बौद्धिक दास्य में भारत ‘मूर्ति पूजन नाजायज है’ कहने की सोच कहाँ से उत्पन्न हुई?  

‘मूर्ति पूजन नाजायज है’ कहने की सोच कहाँ से उत्पन्न हुई?  

by S. N. Balagangadhara
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रिलिजन में मूर्ति पूजा करना पाप समझा जाता है। उसे ऐडोलेट्री नाम से पुकारते हैं। इसीलिए पाश्चात्यों को भारतीयों का मूर्ति पूजन ही हिन्दू रिलिजन की अवनति का लक्षण लगा। शिक्षित भारतीय लोग भी इसे ठीक मनाते हैं। परन्तु वह धारणा कैसे बनी ये नहीं जानते हैं। 

   जब हमारे साम्प्रदायिक पूजा-पाठ का आचरण होता है, तब हमारे प्रगतिवादी चिन्तक सदैव उसका विरोध  करने का पुण्य कार्य करते हुए अपना परम कर्तव्य निभाते हैं। अर्थात् प्रगतिवादी चिन्तक होने का मतलब हमारे साम्प्रदायिक पूजा-पाठ में भाग नहीं लेना। प्रगतिवादी कहलाने वाले लोगों को कभी ऐसे आचरणों में भाग लेने का अवसर आने पर वो घरवालों की मर्जी से या अन्य किसी कारण से भाग जरूर लेते हैं। पर यह प्रयास जरूर करते हैं कि यह किसी को मालूम न हो। यदि मालूम हो जाय तो वह बहुत बड़ी चर्चा का विषय बन जाता है। लोग उनकी निंदा भी करते हैं। सवाल उठता है कि प्रगतिवादी चिन्तकों को मूर्ति पूजा के प्रति नफरत क्यों है? वो लोग मूर्तिपूजा को नाजायज आचरण क्यों मानते हैं? इस सवाल के जवाब में कई वैचारिक धारायें हैं। इनमें एक धारा यह है कि वो लोग समझते हैं कि भारतीय समाज की कुरूढ़िवादिता, अन्धविश्वास, शोषण वगैरह जो है वह मूर्ति पूजा से जुडा हुआ है। इसी कारण से भारत में प्रचलित अनेक धार्मिक आचरण आजकल विवादास्पद बने हैं। 

   देवीदेवताओं की मूर्तियों का पूजन करना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। सामान्य लौकिक स्तर से लेकर आध्यात्मिक स्तर तक के लोग पुरुषार्थ सिद्धि के लिए मूर्ति पूजन करते हैं। संसार में कोई कष्टकार्पण्य आये, दुखद घटना हो तब हम विवश होकर इन देवताओं की शरण में जाते हैं। इन पूजा विधान के विभिन्न आयाम हैं। जप, तप, नामस्मरण, भजन, तीर्थयात्रा आदि विविध पूजा विधान हैं। जो निष्ठा से पूजापाठ करते हैं, उनके प्रति समाज में आदरभाव है। हमारे साम्प्रदायिक कथाओं में आने वाले भक्तों का चित्रण भी सदाचारी तथा धर्मभीरु प्रकार का होता है। वे सामाजिक दृष्टि से अनुकरणीय हैं। इन कहानियों में दुष्ट व दुराचारी लोग सज्जनों का विरोध करते हैं। अंत में दुर्जनों की हार और सज्जनों की जय होती है। पूजा करने वालों के आचरणों में बाह्याडंबर रहे व निष्ठा न रहे तो उसकी निंदा जरूर करते हैं परन्तु आचरणों की निंदा कोई नहीं करता है, यह हमारे समाज का वास्तव है। हमारे समाज में मूर्ति पूजा का ऊँचा स्थान है। ऐसी संस्कृति में मूर्तिपूजा का विरोध करने की बात कहाँ से निकली? आश्चर्य लगता है। आखिर मूर्तिपूजा का अर्थ क्या है। किसी देवीदेवता की मूर्ति को रखकर पूजा करना। हमारे प्रगतिवादी चिन्तक मूर्तिपूजा की अवहेलना क्यों करते हैं? क्योंकि बहुत सारे लोगों को यह मालूम ही नहीं है कि आज मूर्तिपूजा का जो विरोध हो रहा है; वह इसीलिए है कि मूर्तिपूजा अंग्रेजी ऐडोलेटरी शब्द का भाषांतर है। इसी कारण से यह खलबली मची है। आम लोगों को यह पता नहीं है कि ऐडोलेटरी का मूल अर्थ क्या है? वह एकसाथ झूठा (False) रिलिजन और पापकार्य (Sin) का पर्यायवाची शब्द है। ऐडोलेटरी जो है वह मूर्ति पूजा करने वालों के जीवनक्रम को ही अनैतिक बना देती है। तो रिलिजन के अनुसार मूर्ति पूजा पापकार्य (Sin) क्यों है? इसके लिए अच्छा उदाहरण अंग्रेजी फिल्मटेन कमांडमेंट्सको ले सकते हैं। उसमें बाइबिल की कहानी चित्रित है। उसमें मोसेस यहूदियों को ईजिप्ट से छुड़वाकर ले आता है। उन्हें सिनाय पर्वत के तले छोड़कर गॉड से दस आज्ञाओं को लाने के लिए पर्वत चढ़कर ऊपर जाता है। इसी बीच ये यहूदी लोग मूर्ति बनाकर पूजा करते हैं। पूजा करते ही उन सभी का मन भ्रष्ट हो जाता है। वे लोग दुराचार व बुरे काम में तत्पर हो जाते हैं। उनमें पहले जो सदाचारी नागरिकता थी वह लुप्त हो जाती है। वे समझ लेते हैं कि मूर्तिपूजा करने से आदमी भ्रष्ट हो जाता है। भारतीय संस्कृति में मूर्तिपूजा के प्रति इस प्रकार का पूर्वाग्रह नहीं है। क्योंकि भारतीय संस्कृति के लोग यह विश्वास करते हैं कि भगवान की मूर्ति की पूजा करने से आदमी सन्मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

   रिलिजन में मूर्तिपूजा करना क्यों Sin है? क्योंकि उन्हें दैवी आज्ञा (Commandment) है कि True God के अलावा अन्य किसी की भी आराधना नहीं करनी चाहिए। उनके पवित्र ग्रन्थ में वर्शिप के बारे में जिस प्रकार मार्गदर्शन किया गया है केवल उसी प्रकार करना है। कोई भी व्यक्ति वर्शिप को मनमाने ढंग से नहीं कर सकता है। यह दैवी आज्ञा (Commandment) है। True God की आज्ञा का उल्लंघन करना Sin (पाप) होगा। मूर्ति के रूप में पूजित होने वाली देवताएँ शैतान (Satan) का धोखा है। तो शैतान कौन है? True God को न मानने वाली दुष्टशक्ति ही शैतान है। शैतान झूठे देवों का सृजन करके लोगों को True God से विमुख कर देता है। उन्हें पथभ्रष्ट कर भटका देता है। उन देवताओं के पीछे छिपकर अपनी दुष्टशक्ति दिखाता है और लोगों में भ्रांति पैदा करता है। मूर्ति पूजन द्वारा लोग गॉड की आज्ञा का उल्लँघन करके नरक (Hell) में सदा के लिए सडते (Eternally Damned) हैं। 

   मध्ययुग में भारतीय संस्कृति के ऊपर मुसलमानों एवं ईसाइयों द्वारा किये गये हमलों में मंदिरों एवं मूर्तियों को तोडने की प्रथा पर उपरोक्त कहानी प्रकाश डालती है। उन्हें हमारे देवताओं की मूर्तियाँ धोखा देने वाले डेविल (Devil) अथवा शैतान (Satan) जैसे दिखाई दिये। उन्हें हमें दिखाना था कि मूर्तियों का पूजन करने से कुछ नहीं होता है, इन मूर्तियों में कोई दैविक शक्ति नहीं है। मूर्ति भंजन, मंदिर नाश के पीछे उनका उद्देश्य था कि धर्म भ्रष्ट हुए भारतीयों को True God के दिखाये रास्ते पर लाना। वे इस करतूत को पवित्र कार्य समझे होंगे और सांस्कृतिक भिन्नता की विकृति के कारण से एक संस्कृति के अनुसार जो पवित्र कार्य है वह दूसरे के लिए घोर पाप माना गया। 

   रिलिजनवालों को True God की आज्ञा ही अंतिम नियम है। उसका पालन ही नीति है। झूठे देवताऔं की पूजा करने वाले लोग कभी भी True God की आज्ञा का पालन नहीं कर सकते। शैतान की वर्शिप करने वाले लोग अनैतिक हैं, ऐसा रिलिजन कहता है। इस प्रकार का प्रोटेस्टांट दृष्टिकोण लेकर 17वीं शताब्दी में भारत आए हुए मिशनरियों एवं पर्यटकों को भारतीय संस्कृति के बारे में गलतफहमी होना स्वाभाविक था। इस सोच के पीछे भी एक ऐतिहासिक घटना है। रोमन कैथोलिक चर्च ऐडोलेटरी करता है कहकर, प्रोटेस्टेंट भड़क उठे थे। उनके अनुसार एडोलेटरी (मूर्ति पूजा) करने वालों के कई सिद्ध लक्षण हैं, जैसेपुरोहितशाही, भेदभाव, सांप्रदायिकआचरण आदि। इसी बीच यूरोप में सेक्युलरिज्म भी प्रोटेस्टेंट चिंतनों को अपनाकर पल्लवित हो रहा था। प्रोटेस्टेंटों का कहना था कि केवल उनका रिलिजन सही (True) रिलिजन है, बाकी सब झूठे (False) हैं। इसीलिए केवल उनके तत्त्व नैतिक मानदंड है। इस प्रोटेस्टेंट चिंतन ने आधुनिक यूरोप के लोगों की नैतिकधारणा को रूपायित किया था।

   उपरोक्त धारणा के चलते भारत आए यूरोपियन लोगों ने निर्णय लिया कि भारत जैसे हीदन समाज में अनैतिक, अमानवीय एवं भ्रष्ट आचरण होना स्वाभाविक है। वे लोग जिस पूर्वाग्रह से आए थे, उन्हें भारतीय सांप्रदायिक आचरणों में उसके कई सबूत मिलने लगे। उन लोगों ने यहाँ की सामाजिक, धार्मिक पद्धतियों में पाये जाने वाले विकट, अनैतिक आचरणों को दिखाने की कोशिश की। भारत आए हुए पर्यटकों एवं मिशनरियों ने भारतीय समाज का वर्णन इस प्रकार किया कि हिंदूइज्म् में भ्रष्टता, जाति व्यवस्था, पुरोहितशाही, विकृत लैंगिक आचरण आदि भरे हुए हैं, ये सभी ऐडोलेटरी के लक्षण हैं। इस प्रकार के पूर्वाग्रह से आए हुए वो लोग भारत में हीदन समाज है, हिन्दूइज्म् भ्रष्ट रिलिजन है कहकर यहाँ एडोलेटरी के दुष्परिणामों को जुटाने लगे। साथ ही एडोलेटरी हिन्दूइज्म का एक बुरा लक्षण है कहकर उन्होंने भारतीय संस्कृति का वर्णन बुरे ढंग से किया। पूरे यूरोप मे भारत के प्रति इस प्रकार के पूर्वाग्रह फैलाने में समर्थ बने। 

   उपनिवेशी कालखंड में भारतीय सुधारणावादी लोग प्रोटेस्टेंट चिंतन से प्रभावित हुये, इसीलिए वे  यह मान गये कि भगवान का एक रूप का प्रतिपादन करने वाली निराकार उपासना ही सही आचरण है। मूर्तिपूजन केवल वैविध्य की सृष्टि करता है। इसीलिए वह मौढ्य है। हमारे आधुनिक सुधारणावादी चिंतक प्रोटेस्टेंट तत्त्वों से इतने प्रभावित हो गये की बोलने लगे, सनातन हिन्दूधर्म वेदकाल में ठीक था, बाद में पूरोहितशाही के कारण वह भ्रष्ट हो गया। उपरोक्त प्रोटेस्टेंट तत्त्वों को आधार बनाकर उन सुधारणावादियों ने भारतीय इतिहास की रचना भी की। उसी के मुताबिक उपनिवेशी काल में हिन्दूइज्म की सुधारणा करने के अनेक कार्यक्रम जारी हुए। परन्तु राष्ट्रीय युग में ऐसे कार्यक्रम अर्थहीन बने। फिर भी नेहरू युग में ऐसे विचारों को पुनः चमकाया गया। नेहरू युग के वैज्ञानिक आविष्कार एवं आधुनिकता के फलस्वरूप भारतीय जनमानस का मौढ्य बर्फ की तरह गल जायगा। उसका नामोनिशान नहीं रहेगा। परन्तु हुआ क्या? भारतीयों के मूर्तिपूजन की इच्छा नाश होने के बदले और भी मजबूत बनी। भारत की आर्थिक अभिवृद्धि जैसीजैसी हुई, मूर्ति पूजन के नित्यनवीन मार्ग भी आने लगे। भारतीय प्रगतिवादी चिंतक सोचते हैं कि जबतक भारतीय समाज मूर्तिपूजन और उससे संबंधित यज्ञयाग, व्रतनियम आदि को नहीं छोड़ते तब तक उसका उद्धार नहीं होगा। मूर्तिपूजन की अवहेलना करनेवाले चिंतकों ने उपरोक्त क्रिश्चियानिटी की कपोल कल्पित कहानी को दुहराने के अलावा कोई ठोस सबूत आजतक नहीं पेश किया। एक ओर ऐसे सोकाल्ड चिंतक, दूसरी ओर हमारे अपनी संस्कृति के ठोस अनुभव, इनके बीच में, आधुनिक पीढ़ी के लोग जर्जरित हुए हैं। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा है कि मूर्तिपूजन क्यों नाजायज है? इसे क्यों नहीं करना चाहिए। पाठ्य पुस्तकों में, वैचारिक लेखों, में भारतीय संस्कृति की, मूर्ति पूजन की, हमारे भक्ति सम्प्रदाय की अवहेलना मौढ्य निवारण के नाम पर होते हुए भी लोग घर में पीढ़ी दर पीढ़ी से आये हुए सांप्रदायिक आचरणों को अन्यान्य रीति से करते रहते हैं। उनके लिए हमारे धार्मिक आचरण कदाचित् अनैतिक आचरण नहीं हैं। 

   इन सभी समस्याओं के मूल में एक भाषांतर (अनुवाद) के कारण से खड़ी समस्या है। उसी अनबुझी पहेली ने पूरे जन-मानस को विवश बना दिया है। 

Authors

  • S. N. Balagangadhara is a professor emeritus of the Ghent University in Belgium, and was director of the India Platform and the Research Centre Vergelijkende Cutuurwetenschap (Comparative Science of Cultures). His first monograph was The Heathen in his Blindness... His second major work, Reconceptualizing India Studies, appeared in 2012.

  • (Translator) अध्यक्षा स्नातकोत्तर हिन्दी अध्ययन एवं संशोधूना विभाग, कुवेंपु विश्वविद्यालय, ज्ञान सहयाद्रि शंकरघट्टा, कर्नाटक

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