Home बौद्धिक दास्य में भारत ‘वर्शिप’ और ‘पूजा’ एक ही है, नामक गलतफहमी

‘वर्शिप’ और ‘पूजा’ एक ही है, नामक गलतफहमी

by S. N. Balagangadhara
15 views
रिलिजन मेंवर्शिपशब्द का विशिष्ट अर्थ है और उसका अपना खास आचरण है। भारत में हिन्दूइज्म है यह कहकर गलतफहमी से आये हुए पाश्चात्यों को भारतीयों की पूजा वर्शिप जैसी दिखाई दी। पूजा को देखकर उन्हें लगा कि यह इनके गलत आचरण हैं और हिन्दू धर्म की अधोगति का यह एक अच्छा उदाहरण है। 

    भारतीय लोग गाय, बैल, बंदर आदि अनेक प्राणियों को भी देवता स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं। यह विशिष्ट पूजा पद्धति पश्चिम के लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करती है। उपनिवेश काल में आये क्रिश्चियन मिशनरियों और बाद के विद्वानों को यह बात आश्चर्यकारक लगी। उन लोगों ने इन पद्धतियों की अन्धविश्वास कहकर निंदा की है। पश्चिम की दृष्टि में यह पूजा पद्धति अन्धविश्वास (Superstition) लगना सहज है। इस विषय के बारे में अन्य स्थानों में चर्चा हुई है। इसके साथ अनुवाद के सन्दर्भ में जो गलतफहमी हुई है, उससे अनेक नई समस्यायें उत्पन्न हुई हैं। भारतीय लोगों की पूजा पद्धति को अन्धविश्वास कहकर निंदा करने के पीछे पूजा शब्द का अंग्रेजी में वर्शिप अनुवाद हुआ है उसका भी बड़ा महत्त्व है। क्योंकि यदि पूजा शब्द का अनुवादवर्शिपमें किया जाय तो वर्शिप (Worship) शब्द के अर्थ की दृष्टि से पूजा अन्धविश्वास ही होती है। 


रिलिजन में वर्शिप शब्द के लिए निर्दिष्ट अर्थ है। हर रिलिजन के निर्दिष्ट True God रहता है। रिलिजन के अनुयायी मात्र उस रिलिजन के True God की उपासना करते है। क्योंकि उनके अनुसार केवल True God उनके सृजनहार हैं और वही सर्वशक्त सर्वोपरि (Sovereign) हैं। True God के बारे में ऐसा विश्वास रखने वाले किसी भी व्यक्ति को उस True God के स्थान पर किसी अन्य God को रखना सम्भव नहीं है। मजे की बात यह है कि किसी भी रिलिजन का अनुयायी किसी अन्य रिलिजन के True God की शरण में नहीं जा सकता है। क्योंकि यदि वो किसी अन्य रिलिजन के God को True मानता है, तो वह अपने रिलिजन को True नहीं मानता है ऐसा अर्थ निकलता है। इसी कारण से वर्शिप शब्द का विशिष्ट अर्थ है और रिलिजन में वही निर्णायक मुद्दा है। वर्शिप का सही ढंग से आचरण होना चाहिए। इसीलिए रिलिजन में हफ्ते में एक बार एक निर्दिष्ट आचरण करने का कडा नियम रहता है। वर्शिप के साथसाथ रिलिजन के सत्य प्रवचनों (True Doctrines) को सुनना भी महत्त्वपूर्ण है। 


18वीं शताब्दी के कई चिन्तकों ने True God के कहानी को नकारा। येअथेइज्मनाम से जाना जाता है। (‘अथेइज्मशब्द का अनुवाद निरीश्वरवाद, नास्तिकवाद आदि नाम से हुआ है।) उसके प्रतिपादक विचारवादियों को रेशनालिस्ट नाम से जाना जाता है। इन विचारवादी लोगों का प्रतिपादन यह है कि प्राकृतिक व्यवहार के पीछे गॉड की कोई योजना उद्देश्य नहीं रहता है। ऐसा जो विश्वास है वह मिशनरियों ने बनाई हुई झूठमूठ की कहानी है। इनका दावा है कि ऐसी कहानियों को सत्य मानकर चलने से समाज की अभिवृद्धि नहीं होती है। इन चिन्तकों ने वैचारिकता को महत्त्व दिया है। उनका मानना यह है कि वैज्ञानिक रीति से चिन्तन करने मात्र से सामाजिक अभिवृद्धि सम्भव है। इसी बात को लेकर उन्होंने रिलिजन की कहानी दोहराने के बदले अपने रीति से वैज्ञानिक सत्यों का प्रतिपादन किया। 


पश्चिम के श्रद्धालु उसका निराकरण करने वाले आधुनिक चिन्तकों का दृढ़ विश्वास था कि भारत में हिन्दूइज्म नामक रिलिजन है। विपर्यास की बात है कि उपरोक्त दोनों गुट के लोगों ने भारतीय पूजा परम्परा की विडंबना, टीका, टिप्पणी की है। वे लोग समझ चुके थे कि पूजा (वर्शिप) के बिना रिलिजन नहीं हो सकता। हिन्दूइसम में वह होना ही चाहिए। जब वे भारत आये तब हिन्दू लोग नाना प्रकार की पूजा करते थे। केवल मूर्तियाँ थीं, बल्कि गाय, बैल, बंदर पेड़, पथर, नदी नहर जाने किसकिस चीज की पूजा की जाती थी। ये सब उन्होने वर्शिप (Superstitions) समझकर हिन्दूइज्म की टीका की। हिन्दूइज्म पहले ठीक था कालांतर में उसकी अवनति हुई कहने के लिए, उपरोक्त पूजा पद्धतियाँ ठोस उदाहरण हुई। पूजा सम्बन्धी इन दोनों गुटों की टीका टिप्पणी एक ही धारणा से निकली हुई थी। वर्शिप का मतलब क्या है? आप जिस True God पर भरोसा रखते हैं, उनके उद्देश्य (Will) के प्रति नतमस्तक होकर, उन्होने बताया हुआ आचरण करना अथवा True God पर दृढ़विश्वास रखना आदि। भारतीय पूजा विधान कैसा है। ये पेड़, पौधे से लेकर प्राणी, पक्षियों तक की पूजा करते हैं, ऐसा कहकर वे हमारा उपहास करते हैं। परन्तु यह उन्हें मालूम ही नहीं है कि भारतीय पूजा का उद्देश्य सृष्टिकर्ता (Creator God) के सामने नतमस्तक होना नहीं है। भारत में किसी को पूजा करने का कोई बन्धन (Obligation) नहीं है। करे करे चलता है। पूजा विधान में भी एक क्रम नहीं है। यहाँ वस्तु से लेकर व्यक्तियों तक की पूजा होती है। जैसे पाद पूजा, गुरु पूजा, वस्तु पूजा, आयुध पूजा वगैरहवगैरह करते हैं। उस पूजा को खड़े होकर, साथ बैठकर, परिक्रमा करके, नमस्कार आदि अनेकानेक प्रकार से करते हैं। 


शुभ कार्यों या मुहूर्तों में व्यक्तियों की भी आरती उतारते हैं। आरती केवल भगवान की मूर्ति के लिए ही हो, ऐसा कोई कायदा नहीं है। इसीलिए पूजा और पश्चिम के लोगों की सृष्टिकर्ता को नतमस्तक होने की क्रिया का समीकरण नहीं हो सकता है। वर्शिप के साथ पूजा का जो उन्होंने समीकरण किया है वह बिल्कुल गलत है। 


हम पूजा के नाम पर जो कुछ करते हैं, उसका अंग्रेजी अनुवाद वर्शिप ही करते आये हैं। यदि हमें वर्शिप के बारे में सही जानकारी होती तो हम कभी हमारे पूजापाठ के साथ वर्शिप का बालिश रीति से समीकरण नहीं कर बैठते। वर्शिप में केवल निर्दिष्ट देव को ध्यान में रखकर उसे सिर झुकाया जाता है, क्योंकि वह सचमुच ही सृष्टिकर्ता है, उसका उद्देश्य पूरा करना ही लोगों का परम कर्तव्य है। भारतीय लोगों का पूजा विधान भिन्न है। मान लीजिए कि एक क्षेत्र के व्यक्ति मन्दिर में जाते हैं। मान लीजिए वह शिवजी का मन्दिर है। मुख्य शिवजी होते हैं। उसके साथ गणेश, पार्वती जाने कौनकौन अनेक परिवार की देवीदेवताएँ होंगे। उन सबकी हम पूजा करते हैं। जहाँजहाँ अर्चक होंगे, वहाँ हमारे पूजा के कर्म भी होंगे। एक रिलिजन के अनुयायी ऐसे अनगिनत देवीदेवताओं पर विश्वास करने लगे तो? यह नामुमकिन है। असम्भव है। 


हम जिसे पूजा कहते हैं; वह विधान हमारे वर्णन से परे है। क्योंकि हम विभिन्न पर्वत्योहारों में चक्की से लेकर, गाय बैल, मोटर बाइसकिल तक की पूजा करते हैं। दिवाली साक्षात लक्ष्मी का अंश माना जाता है। इस पूजा विधान को वर्शिप कह सकते है क्या? वर्शिप में सृष्टिकर्ता (Creator God) का होना, सृष्टि के पीछे उसका उद्देश्य (Will) होना, उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमारी सृष्टि हुई कहकर विश्वास रखना आदि विशेषता रहती है। हमारे पूजित गाय बैल के कौन से उद्देश्य हो सकते हैं? इनके किस उद्देश्य के अनुसार हमारा जीवन होगा। यह कुछ अटपटा लगता है। 


सेमेटिक रिलिजन के लोगों को हमारी पूजा विधान अटपटा लगे तो आश्चर्य नहीं है। पश्चिम की धारणा से हमारे पूजा विधान की अवहेलना करने वाले हमारे अपने चिन्तकों को क्या कहें? पूजापाठ करने वालों को अन्धविश्वास (Superstition) कहकर वह दुतकारते हैं। समझने की बात यह है कि हम जिन वस्तु व्यक्तियों की पूजा करते हैं; ये मानकर नहीं कि वे हमारे सृष्टिकर्ता हैं, बल्कि यह मानकर कि ये सभी हमारे जीवन क्रम के आधारभूत वस्तु, व्यक्ति, प्राणी, पक्षी हैं। इस प्रकार समझकर पूजा करना भारतीयों का जीवन क्रम है। इन वस्तु, व्यक्तियों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए पूजा एक साधन है। इसीलिए भारतीय पूजा विधान को वर्शिप के साथ जोडकर पूजा करने वालों को मूढ़ मंदमति कहकर अवहेलना करना पाशिचमात्य लोगों को ठीक लगेगा परन्तु भारतीयों को समझ में ही नहीं आयेगा कि क्यों वे अवहेलना कर रहे हैं। 

Authors

  • S. N. Balagangadhara is a professor emeritus of the Ghent University in Belgium, and was director of the India Platform and the Research Centre Vergelijkende Cutuurwetenschap (Comparative Science of Cultures). His first monograph was The Heathen in his Blindness... His second major work, Reconceptualizing India Studies, appeared in 2012.

  • (Translator) अध्यक्षा स्नातकोत्तर हिन्दी अध्ययन एवं संशोधूना विभाग, कुवेंपु विश्वविद्यालय, ज्ञान सहयाद्रि शंकरघट्टा, कर्नाटक

You may also like

Leave a Comment