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भारत में धर्मग्रन्थों, तत्त्वों की खोज और विद्वानों की फजीहत

by S. N. Balagangadhara
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प्राचीन भारत में रिलिजन होते हुए भी आधुनिक चिंतक बौद्ध, शैव, जैन, हिन्दू आदि रिलिजनों की सृष्टि कर बैठे हैं। परन्तु रिलिजन की खास विशेषता जो होती है, जैसे देववाणी, प्रवादि पवित्र ग्रन्थ आदि यदि ये सभी लक्षण हमारे संप्रदायों में हैं कहकर दावा करें तो अनंत समस्याओं का शिकार बन जाते हैं। हमारे संप्रदाय जो हैं वे रिलिजन नहीं हैं कहने के लिए ये समस्याएँ ही ठोस उदाहरण हैं। 

    भगवद्गीता को स्कूलों में पढ़ाने के विषय को लेकर पिछले साल कर्नाटक में सनसनीखेज विवाद पैदा हुआ था। एक ओर हिन्दू धर्म को बचाने के लिए ऐसा एक प्रयास होना चाहिए कहने वालों का गुट, दूसरी ओर सभी धर्म के बच्चे एकसाथ पढ़ाई करने वाले सार्वजनिक स्थल में किसी एक रिलिजन के (बहुसंख्यकों का) धर्म ग्रन्थ को सिखाना सेक्युलर तत्त्व का और भारतीय संविधान का अपचार होता है कहने वालों का दूसरा गुट। यह समस्या हमारी अपनी गलतफहमी से हुई है। वह कैसे? आगे देखेंगे।


हम कॉलेज की पाठ्य पुस्तकों में बौद्ध धर्म के तत्त्व, जैन धर्म के तत्वों को पढ़ते आये हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर स्नातकोत्तर तक इन धर्मोपदेशों में हिन्दू धर्म के तत्त्वों को पढ़ते आये हैं। बुद्ध का उपदेश कहें तो दया, अष्टांग मार्ग आदि, जैन धर्म के तत्त्वों में अहिंसा, स्याद्वाद आदि आते हैं। हिन्दू धर्म में वर्णाश्रमधर्म कर्म आदि आते हैं। 


यह यहाँ तक ही सीमित नहीं होता है। आधुनिक सेक्युलर चिंतक बोलते हैं कि इन सभी तत्त्वों को उनके अपने पवित्रग्रन्थ के रूप में बनाये रखे हैं। जैसा कि बौद्धों का त्रिपिटक, हिन्दुओं का वेद, जैनों का पाळीसूत्र आदि। इन धर्मों के तत्त्वों का उनके अपने धर्म संस्थापक ने ही उपदेश दिया है। इन सभी ने सभी ज्ञानोदय के उपरांत ही धर्मोपदेश करना शुरू किया है। ज्ञानोदय का चित्रण भी ऐसा किया गया है कि वह सहसा हो जाता है। उसके बाद सत्य का साक्षात्कार होता है। (जैसे सेमेटिक रिलिजन में सहसा गॉड प्रत्यक्ष होकर उपदेश देता है ? ठीक वैसे) उसके बाद उपदेश करना मात्र बाकी रहता है। उस उपदेश के आधार पर उनका अपना रिलिजन पैदा होता है। अपने रिलिजन के उपदेश के अनुसार लोग आचरण करते हैं। उन रिलिजन के अनुयायी उन तत्त्वों का आचरण करते हैं एवं उन्हें ग्रन्थ रूप में संग्रहित करते है। क्रिस्त और इस्लामिक हिस्टरी में और उपरोक्त बताये गये भारतीय रिलिजनों की हिस्टरी के चित्रण में यही समान अंश है। वह एकदूसरे की नकल जैसा है। क्योंकि भारत के हिस्टोरिक घटनाओं को रिलिजन के चौखट में रखकर समझने का प्रयास किया गया है। 


यहाँ धर्म को रिलिजन और तत्त्वों को डॉक्ट्रिन के नाम से जाना जाता है। (रिलिजन के वास्तविक अर्थ के बारे में पहले ही चर्चा हो चुकी है।) धर्म ग्रन्थ होली स्क्रिप्चरशब्द का अनुवाद है। ज्ञानोदय रिविलिएशन शब्द का अनुवाद है। हम ये सोचते हैं कि इन शब्दों का अनुवाद करने मात्र से काम पूरा हुआ है। परन्तु ये केवल सामान्य शब्द हैं बल्कि ये रिलिजन की परिभाषाएँ हैं। 


स्वयं इस ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता ने (एक मनुष्य) प्रवादि को सत्य प्रकट किया है। उसे रिविलिएशन अथवा देववाणी बोलते हैं। जो देववाणी का उपदेश स्वयं सृष्टिकर्ता से पाता है वह प्राफेट अथवा प्रवादि कहलाता है। उस देववाणी को जिसमें अंकित किया जाता है, उसे होलि स्क्रिप्चर (पवित्र ग्रन्थ) कहतें है। उस ग्रन्थ में जो उपदेश रहता है उसी के आधार पर उस रिलिजन के अनुयायियों का आचरण निर्धारित होता है। उन तत्त्वों को डॉक्ट्रिन कहते हैं। एक रिलिजन का एकमेव True God हो सकता है। एक ही प्रवादि एक ही देववाणी, एक ही पवित्र ग्रन्थ होना रिलिजन की विशिष्ट परिकल्पना है। 


परन्तु भारतीय सन्दर्भ में धर्मग्रन्थ देववाणी, धर्म तत्त्व आदि शब्दों का असम्बद्ध प्रयोग हो रहा है और इन शब्दों से भारतीय परम्पराओं के बारे में कोई ज्ञान प्राप्त करना नामुमकिन है। वह कैसे? आगे देखेंगे. उपरोक्त वर्णन से एसुक्रिस्त, पैगंबर, बुद्ध, महावीर आदि लोग एक रीति से धर्म संस्थापक माने जाते हैं। परन्तु इस विचार को लेकर अनेक सवाल उठते हैं जिसका सही उत्तर है ही नहीं। जैसा कि जैनों में महावीर 24वें तीर्थंकर हैं, वे कैसे धर्म संस्थापक हो सकते हैं? जैन और बौद्ध लोग नास्तिक पंथ के हैं, उनके True God ही नहीं हैं, True God ही नहीं हैं तो देववाणी कहाँ से आती है? वे प्रवादि कैसे कहलाए जाते हैं? देववाणी ही नहीं है तो डॉक्ट्रिन का सवाल ही नहीं उठता। 


हिन्दूइज्म में एकैक देव की परिकल्पना नहीं है, अनेक देव हैं। उसके संस्थापक भी नहीं हैं। देववाणी किसके द्वारा प्रकट हुई? इन समस्याओं का परिहार करने के लिए हमारे लोग बारबार वेद अपौरुषेय है इस बात को दुहराते रहते हैं। परन्तु यह सुलभ रीति से सुलझने वाली समस्या नहीं है। सवाल उठता है कि भगवदगीता का उपदेश स्वयं कृष्ण ने किया है। उसे देववाणी का दर्जा दे सकते हैं क्या? उसी तरह अन्यान्य सन्दर्भ में देवताओं ने उपदेश दिये हैं। वे ग्रन्थों में संग्रहित हैं। उन्हें क्या नाम दिया जाय? यदि हम मान लें कि एक रिलिजन की एकैक देववाणी होनी चाहिए तो ये सब हिन्दूओं की ही देववाणियां कैसे हो सकती हैं? विद्वान लोग आज भी इसके बारे में सिर खुजलाते रहे हैं। 


ठीक है विद्वानों की इन समस्याओं को यहीं छोड़ देंगे। रिलिजन के अनुयायियों की ओर जरा दृष्टिपात करेंगे। उपनिवेश के कालखंड में भारत आये पाश्चात्य यात्रार्थियों को यहाँ एक सामान्य अनुभव हुआ है जिसे उन लोगों ने अंकित किया है। उनका कहना है कि बहुत सारे ब्राह्मणों को हिन्दू धर्म और उसके तत्त्व के बारे में सही जानकारी नहीं थी। वे उस विषय में अज्ञानी ही थे। पाश्चात्यों ने व्यंग्य कसा कि ब्राह्मण इतने अज्ञानी थे कि उनमें अपने धर्म ग्रन्थ पढ़ने की योग्यता तक नहीं थी। मैं एक ब्राह्मण परिवार में जन्मा साम्प्रदायिक परिवार में पला एक सामान्य आदमी हूँ। मुझे अनुसन्धान करने तक वेद उपनिषदों का सामान्य ज्ञान तक नहीं था। हिन्दू धर्म के पुरोहित कहलाने वाले ब्राह्मणों को भी इसका ज्ञान नहीं था तो दूसरे लोग क्या जाने


यदि ये सब वाकई रिलिजन ही है तो समस्या ही नहीं होती थी। ऐसे सवाल ही नहीं उठते थे। किसी भी क्रैस्त के सामने यह समस्या नहीं आती है कि उसके प्रवादि क्रिस्त हैं या पैगंबर अथवा यूँ कहिए कि किसी भी मुसलमान को यह समस्या नहीं आती है कि उसका होलिस्क्रिप्चर कुरान है या बाइबिल। ये सवाल भी उठेगा कि सभी क्रैस्त अथवा मुसलमान अपने होलिस्क्रिप्चर के बारे में सब कुछ जानता है क्या? मान लीजिए कि वह नहीं जानता है। पर खोजने से उसे एक ही उत्तर मिलता है। हमारे जैसे अनगिनत उत्तर नहीं, क्योंकि वहाँ प्रवादि और होलिस्क्रिप्चर हैं। हिन्दू धर्म में नहीं है। इसीलिए खोजने पर भी नहीं मिलता है। जो है ही नहीं तो उसके बारे में ज्ञान कैसे हासिल कर सकते हैं? भारत में सदियों से यही होता रहा है, जो नहीं है वह है कहते आये हैं, हम इस भ्रम में फँस गये हैं और दूसरों को भी फँसा रहे हैं। पाश्चात्य लोग समझते है कि रिलिजन सर्वत्र है। इसका तात्पर्य यह है कि दुनिया में ऐसी कोई सभ्यता नहीं है जिसमे रिलिजन हो। इसी तर्क से आये पाश्चात्यों को भारत में हिन्दूइज्म, बुद्धिइज्म, जैनिइज्म आदि रिलिजन जैसे दिखाई दिये तो उन्होंने उसी प्रकार हिस्ट्री लिखा। परन्तु रिलिजन होता तो उसके अंग होलिस्क्रिप्चर, डॉक्ट्रिन आदि तो होने ही चाहिए। इसे ही हिस्ट्री में खोजने का काम शुरू हुआ। परन्तु विपर्यास की बात यह है कि हिन्दुओं को भी उसके बारे में जानकारी नहीं थी। हमारे देसी पंडितों ने पाश्चात्य विद्वानों को इस काम में सहायता पहुँचाने की होड़ में मनमाने ढंग से बातें बताई, जिससे वे और भी भटक गये। तब उन विद्वानों को लगा कि ये लोग मूल ग्रन्थ और तत्त्वों को भूलकर भ्रष्ट हो चुके हैं इसीलिए इनका आचरण भी भ्रष्ट हो चुका है। देसी लोग भी उनकी बात को मान गये हैं। वो क्या कह रहे हैं इनको मालूम नहीं हुआ और ये क्या समझ गये उनको मालूम नहीं हुआ। इस तरह लिखे हुए भारतीय सांस्कृतिक हिस्ट्री की बुनियाद पर पुनर्जीवन के आन्दोलन भड़क उठे। 


रिलिजन के तत्त्व से सम्बन्धित एक रोचक विषय है। रिलिजनों में डॉक्ट्रिन जो है वह आचरणों का निर्देश करता है, रिलिजियस आचरण कैसे किया जाय, क्या किया जाय, आदि बताता है। हम डॉक्ट्रिन को तत्त्व कहकर भाषांतर कर चुके हैं। हमारा विश्वास है कि ये तत्त्व आचरण करने के लिए ही है। परन्तु भाषांतर में एक गडबड हुई है, वह यह है कि तत्त्व जो है वह हमारे सम्प्रदाय में आचरणों का निर्देशन करने वाला विषय नहीं है। तत्त्व, ज्ञान से संबंधित विषय है। वह सभी भारतीय सम्प्रदायों का अन्तिम लक्ष्य है। उसे सभी सम्प्रदाय खोज रहे हैं। बुद्धिज्म, हिन्दूइज्म, जैनिइज्म आदि जो हैं ये सब आध्यात्मिक सम्प्रदाय हैं। ऐसे सम्प्रदायों मे चर्चा की गई तत्त्वों को डॉक्ट्रिन के अर्थ में रखा जाये तो अर्थ का अनर्थ ही होता है। जैसे कि शून्य का आचरण करो, ब्रहमन या परमात्मा का आचरण करो, कहने पर क्या अर्थ निकलता है? हमारे संदर्भ में तत्त्वाचरण शब्द का, रिलिजन में डाक्ट्रिन से जैसा आचार निर्देशित है ठीक उसी तरह विरूपित एक ही अर्थ निकलता है। जो गलत प्रयोग है। अनजाने में हमारे बच्चों को भी हम यही सिखाते आये हैं।  


मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने वालों को कम से कम यह ज्ञान होना अनिवार्य है कि भारत में रिलिजन नहीं है और धर्म जो है वह रिलिजन नहीं हो सकता है। यह भारतीय संस्कृति के अध्ययन का प्रथम सोपान है। यदि हम उसे ठीक से नहीं समझते हैं तो उपरोक्त विकृत चित्रण के अलावा क्या मिल सकता है? ऐसी चित्रणों से भारतीय सम्प्रदायों की कोई ज्ञान प्राप्ति किसी को नहीं होगी। ये पश्चिम से चित्रित भारतीय परम्पराओं के कथन वज्रकवच की तरह हमारे अज्ञान को सर्वदा बनाये रखेंगे। 

Authors

  • S. N. Balagangadhara is a professor emeritus of the Ghent University in Belgium, and was director of the India Platform and the Research Centre Vergelijkende Cutuurwetenschap (Comparative Science of Cultures). His first monograph was The Heathen in his Blindness... His second major work, Reconceptualizing India Studies, appeared in 2012.

  • (Translator) अध्यक्षा स्नातकोत्तर हिन्दी अध्ययन एवं संशोधूना विभाग, कुवेंपु विश्वविद्यालय, ज्ञान सहयाद्रि शंकरघट्टा, कर्नाटक

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